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अंतहीन शुरुआत

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कॉरपोरेट बालाएं, कॉरपोरेट बॉस, मामला बिंदास

Posted On: 11 Aug, 2012 Others में

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बाला के लक्षण कैसे भी हों। अगर बॉस के इर्दगिर्द घूमना सीख लिया। तो समझिए बॉस भी खुश और लड़की भी। तरक्की पसंद बालाए, और बाला पसंद बॉस कॉरपोरेट युग के आदर्श हैं। बाला काम और कपड़ों के प्रति संजीदा न हों, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर बॉस के इर्दगिर्द लट्टू सी घूमना जानती हैं, तो उनमें न कोई कमी न कोई खामी। इसी उद्योग में कुछ दूसरी बालाएं भी हैं। पर कम। जो स्वभाव से उग्र हैं। उनमें ज़िम्मेदारियां निभाने की आग है। कपड़े भी शालीन हैं। ज़ुबान से काम की तेजी झलकती है। लेकिन बॉस के केबिन से दूर ही रहती हैं। तो ऐसी लड़कियां न अपने बॉस के लिए खुशी का कारण बनती हैं। और न ही उनकी भूख मिटाने वाला निवाला। कॉरपोरेट में काम करते हुए भी ये कॉरपोरेट की काली नीतियों से दूर ही रहती हैं। चमचा नहीं बन सकतीं, लट्टू होकर नहीं घूम सकतीं। ज़िम्मेदारी निभाने से मतलब है। ड्यूटी पर आती हैं। ड्यूटी पर जाती हैं। और न ही किसी से फालतू बात। बालाओं को आज के युग में तरक्की बेहद पसंद है। रास्ता आसान हो तो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार, बॉस की बीवी नहीं तो घर पर बर्तन भी मांझ सकती हैं। और आवश्यकता पड़ने पर बीवी की हक़ अदायगी भी कर सकती हैं। सहमति जब स्वतंत्र हो, तो हर रिश्ता वाजिब। दोष न बाला का है, न ही बॉस का है। वक्त की जरुरतों ने गैरतमंदों को भी बेगैरत बना दिया। अब आइना देख कर भी उन्हें लज्जा नहीं आती । क्योंकि लज्जा रुपी विचार को वो कॉरपोरेट की काली दुनिया में गुमा चुके हैं। बाला के लिए बॉस जरुरी, और बॉस के लिए कई बालाएं। चलिए अगर इस नीति से जगत का भला हो तो कुछ ठीक लग भी सकता है। लेकिन जब रिश्ते निजी हितों के लिए ही बने हों, तो प्रबंधन के साथ तो ये धोखे जैसा ही है। बॉस अपने ओहदे और योग्यता का फायदा उठाता है। और बालाएं अपनी अदाओं का । ये बात अलग है कि मटकने वाली बालाओं से बॉस हुनर की तमन्ना कभी नहीं पालता। न ही कभी काम में बरती गई कोताही पर उंगलियां उठाता। उसके सामने कौन काम कर रही है, और कौन काम नहीं कर रही, ये सिर्फ इस पर निर्भर है, कि बाला ने बॉस को कितनी लिफ्ट दी। बॉस तय करते हैं, फलानी हुनरमंदर है, फलानी काम में सच्ची है, फलामी तुमसे बेहतर है और तुम ये क्या करती हो। तुम्हें काम नहीं आता । जाहिल कहीं की (ये उनसे जो समझौतावादी नहीं)। सारी बातें दरकिनार कि जो जाहिल है असल में वही उद्योग को लाभ पहुंचा रही है। नज़र अपनी हो और चश्मा दूसरों का तो सिर्फ बुराई ही नज़र आती है। इठलाने की अदा हर बाला में नहीं होती। समझौते की अदा हर किसी के खून में नहीं होती। कुछ तो ईमानदार भी हैं, जिन्हें देखकर बॉस काला चश्मा चढ़ा लेते हैं। ये बात अलग है कि इठलाने और बलखाने वालियों के सामने वो पूरे नंगे हो जाते हैं। कॉरपोरेट बालाएं, कॉरपोरेट बॉस, मामला बिंदास। इसी युग में हमें जीना है। धिक्कार है ऐसी नीतियों पर । धिक्कार है ऐसी आदतों पर । कब तक इस कॉपोरेट की चकाचौंध में बालाएं अपना शोषण कराती रहेंगीं। कब तक बॉस मजबूरियों का फायदा उठाएंगे। क्यों नहीं योग्यता का सही आंकलन उनके लिए है, जो काम करना जानते हैं। क्या सिर्फ ठिठोलियों से काम चलता है। क्या सिर्फ अदाएं दिखाने से संस्थान चलता है। अपने चश्मे से भी तो आंकिये समाज को । फिर देखिए दुनिया में कितने दीन दुखी हैं। कितने हुनरमंद हैं। कितने लोग सच्चे हैं। कितने ऐसे लोग हैं जिनसे आप खुद प्रेरणा ले सकते हैं।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
August 14, 2012

महत्वाकांक्षा बड़ी बेशर्म होती है अनुपम जी ! इसके सामने और कुछ दिखाई नहीं देता ! बढ़िया लेखन !

rekhafbd के द्वारा
August 13, 2012

आदरणीय अनुपम जी ,सादर नमस्ते ,आजकल आप धापी की इस जिंदगी में संस्कारों का आभाव होता जा रहा है और सब कुछ जल्दी से हासिल करने की इच्छा पता नही इंसान को कहाँ ले जाए गी ,बढ़िया लेख ,बधाई

    anupammishra के द्वारा
    August 13, 2012

    इसी आपा धापी के चलते इज़्ज़त का मानमर्दन कब हो जाता है पता ही नहीं चलता…ऐसी आपा धापी भी किस काम की….

pitamberthakwani के द्वारा
August 11, 2012

अनुपम मिश्रा जी का लेखन इतना सारगर्भित लगा की मेरे पास शब्द ही नहीं है की उनकी तारीफ़ कर सकूं,फिर भी औपचारिका के चलते उन्हें बधाइयां हों,स्वीकार करें आपकी फोटो देखकर लगा आपका लंबा अनुभव है और अनुभव की चाशनी में लपेटे गए ये शब्द और वाक्य हैं जोकिसी को भी प्रभावित किये बिना नहीं रह सकते?मिश्रा जी अपने ऐसा सुंदर और वस्त्वक वर्णन किया है जैसे आँखों देखा हाल!हम आभारी हैiआपके इस लेख से नव युवतीयां यदि कुछ सीख लें तो गोपाल कांदा और अमर मणि त्रिपाठी जैसे धूर्त साहस भी नहीं जुटा पायेंगे.आशा है अपने को परोसने वाली बालाएं आफिस के बाहर ही अपनी भूख कम करेंगी ,जोकि ज्यादा जोखिम वाला काम नहीं होगा!

    anupammishra के द्वारा
    August 13, 2012

    आदरणीय, मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं, कि किस बात की जल्दबाज़ी है लोगों को, क्या इज़्जत से बढ़कर शोहरत है…लेकिन आज लोग इज़्जत खोकर ही शोहरत कमाने के आदी हो गए हैं, सोच बदलनी चाहिए…

dineshaastik के द्वारा
August 11, 2012

आदरणीय अनुपम जी, मुझे लगता है कि इसका मूल कारण नैतिक शिक्षा का अभाव है। इस अर्थ युग में परिवारों से भी नैतिकता विलुप्त हो चुकी है। क्या माँ बाप नहीं इस बात को नहीं समझते है कि मेरी बेटी का बॉस मेरी बेटी पर इतना अधिक मेहरवान क्यों है। वे भी बॉस की ओर से मँहगी गाड़ी एवं बंगले आदि का चश्मा पहन लेने का कारण कुछ  देखते की एवं समझने की क्षमता नहीं रखते।

    dineshaastik के द्वारा
    August 11, 2012

    इस क्राँतिकारी आलेख को जरूर पढ़े- मैं ही हिन्दु. मैं ही मुस्लिम http://amanatein.jagranjunction.com/2012/08/10/12/

    anupammishra के द्वारा
    August 13, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, मुझे लगता है नैतिक शिक्षा अब सबसे ज्यादा दी जा रही है, लेकिन हम उसका मतलब नहीं समझते और यही गलती करते हैं…


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