ये जहां...

अंतहीन शुरुआत

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प्रियतमा तुम्हारी याद में...

Posted On: 14 Apr, 2012 Others में

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प्रिये तुम मायके क्या गईं। मेरी ज़िंदगी कालाहारी रेगिस्तान सी हो गई। एक दम वीरान। प्रिये तुम्हारी तस्वीर देखता हूं। तो उदासी की लाली छंट जाती है। हया से गाल लाल हो जाते हैं। घर की रसोई की तरफ देखता हूं तो बर्तन बजते से सुनाई और दिखाई देते हैं। मानों कह रहे हों, बनाते क्यों नहीं खाना आकर ? तुम्हारी चूड़ियों की खनक सुने एक सप्ताह हो गया। विरहा की अग्नि मुझे झुलसाने लगी है। प्रिये क्या तुमको नहीं लगता तुम्हारी नाराज़गी के ये सात दिन मेरे जीवन की अग्निपरीक्षा बन गए हैं। तुम तो आदत बन गईं इन चंद सालों में। ऐसे कोई नाराज़ होकर कहीं जाता है क्या ? मैं मानता हूं कि मेरा अभिमान कई बार तुम्हारी आन पर भारी पड़ जाता है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता। मेरे कठोर ह्दय में भी एक ह्दय है जहां सिर्फ तुम्हारे लिए मैने दस मंजिला मकान बना रखा है। इन दसों मंजिलों पर तुम रहा करती हो। लेकिन अब दिल का यही अपार्टमेंट आज खाली सा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि अकेलेपन के अहसासों ने अब इस दिल के आशियाने को जबरन किराये पर ले लिया हो। कहीं ऐसा न हो ये निर्दयी अहसास मुझ पर कब्ज़ा कर लें, मुझे अपनी जंजीरों में बांध लें। इससे पहले तुम लौट आओ । मुझे पता है तुम ये पंक्तियां पढ़ कर अपने गुलाब सी पंखुड़ियों वाले होंठों से मुस्कुरा रही होगी। मुझे पता है तुम ये पत्र उस कमरे में पढ़ रही हो। जहां न बाबू जी हैं और न मां। आ जाओ शीघ्र आ जाओ। क्योंकि।

हमारा रिश्ता अटूट है। मैं भ्रमर, तुम पुष्प हो। आंख तुम अश्क हो। मैं रग तुम रुधिर हो। मैं दिल, तुम धड़कन। मैं सावन, तुम हो बसंत। मैं बालू, तुम गंगा । मैं शब्द, तुम स्याही। मैं पथ, तुम राही। मैं चूल्हा तुम फुंकनी । मैं ब्लैक बोर्ड, तुम डस्टर हो । मैं रेता तुम अभ्रक हो। मैं चूना तुम फिटनी हो। मैं बीयर तुम बर्फ। मैं सोडा, हाला हो। मैं एलईडी तुम डीवीडी। मैं प्रसंग तुम उपसंहार। मैं गद्य प्रिये तुम हो कविता। मैं चॉकलेट, तुम कैंडी हो। मैं कंचा तुम, पिल्लू हो। मैं डंडा तुम गिल्ली हो।मै पराकाष्ठा व्यंग विधा, तुम समालोचना जननी हो। मैं खानाबदोश सा पत्रकार, संघर्षशील तुम लेखक हो। मैं नीति नियति तुम राजनीति। मैं शासन तुम, सत्ता हो। मैं जिजीविषा, तुम आशा हो। मैं जनसंख्या, तुम जगजननी। मैं छाया हूं बरगद की तो तुम पीपल की डाली हो। मैं सिस्टम सरकारी सा, तुम आंधी निजीकरण की हो। मैं होठों की गाली तो तुम सुंदर शब्दों की सिरहन हो। मैं मनरेगा तुम रोजगार। मैं बीपीएल, तुम एपीएल। मैं मलिहाबादी आम प्रिये, तुम लौटा गुड़ का ड्राम प्रिये। मैं पाइप तुम पानी हो। मैं नाना तुम नानी हो। मैं बॉलीवुड की रात प्रिये, तुम हॉलीवुड हंगामा हो। मैं प्रश्नपत्र तुम कुंजी हो। मैं विस्मय तुम बोधक हो। मैं किंतु परंतु तुम लेकिन हो। मैं कंचनजंगा की बर्फ प्रिये, तुम एवरेस्ट की ठंडक हो। मैं पापी तुम पुण्य प्रिये। मैं अभिप्राय, तुम आशय हो। मैं पगडंडी तुम मेढ़ प्रिये। मैं श्वेत श्याम तुम मैदा की भेड़ प्रिये। मैं सर्कस के जोकर सा, तुम अदाकार स्पेशल हो। मैं राशि मुआवज़े वाली हूं, तुम सरकारी अनुकंपा हो। मै तमिलनाडु का डोसा हूं, तुम बंगाली रसगुल्ला हो। मैं चाइना की चाऊमीन, तुम जापानी तरकारी हो। मैं मिथ्यावर्णन की बात प्रिये, तुम सच्चाई की मूरत हो। मैं युद्ध भूमि का धनुष बाण और तुम मेरी प्रत्यंचा हो। मैं दशरथ का राम सही पर तुम मेरी रामायण हो। मैं कलयुग का कान्हा हूं, और तुम ही मेरी गीता हो। मैं राम, तुम सीता हो।

प्रिये न जाने क्या हो गया तुम्हारे जाने के बाद। मैं कवि नहीं था, पर कविता लिखने लगा हूं। गायक नहीं था, किंतु गज़ल लिखने लगा हूं। सामाजिक नहीं था, किंतु समाज को समझने लगा हूं। सरकारी मुलाज़िम नहीं था, किंतु सरकार को समझने लगा हूं। प्रेमी नहीं था, प्रेम को समझने लगा हूं। वैरागी नहीं था, किंतु वियोग को समझने लगा हूं। प्रिये तुम्हारे जाने के बाद मैं आंटा दाल का भाव भी समझने लगा हूं। तुम्हारे जाने के बाद से मैं कुप्रबंधन का शिकार हो गया हूं, कब उठता हूं, कब सोता हूं, कब खाता हूं, कुछ पता नहीं। अब कभी नाराज़ नहीं होउंगा। अब कभी तुम्हें सताऊंगा नहीं। कभी फोन पर देर रात बतिआऊंगा नहीं। तुम आ जाओ। बड़ी शिद्दत से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। मेरे प्यारे से पत्र का जवाब जरुर देना । तुम नहीं आईं तो मैं फिर एक पत्र लिखूंगा। अब और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं होता। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नयनी। तुम्हारे इंतज़ार में…

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
April 18, 2012

मैं सिस्टम सरकारी सा, तुम आंधी निजीकरण की हो। मैं होठों की गाली तो तुम सुंदर शब्दों की सिरहन हो। मैं मनरेगा तुम रोजगार। मैं बीपीएल, तुम एपीएल। मैं मलिहाबादी आम प्रिये, तुम लौटा गुड़ का ड्राम प्रिये। दिल कर रहा था आपकी पूरी की पूरी रचना को फिर से लिख डालूँ ! वाह ! मज़ा आ गया ! सच कहूं तो मैंने ये रचना कुछ दिन पहले ही पढ़ ली थी किन्तु समयाभाव के कारन आपको विचार नहीं लिख पाया फिर आज ढूँढा और फिर पढ़ रहा हूँ ! कई कई बार पढने लायक ! वाह ! आप तो बड़े उस्ताद निकले मित्रवर ! बहुत खूब

    anupammishra के द्वारा
    April 22, 2012

    हौसलाअफज़ाई के लिए शुक्रिया भाई….

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 15, 2012

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे.


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